इतिहास के पन्नों में अमर हुए ‘दिशोम गुरु’: शोषितों के लिए जल-जंगल-जमीन की जंग से झारखंड निर्माण तक का महानायक अंततः अनंत में लीन।
पलामू न्यूज Live// मेदिनीनगर: रांची झारखंड की माटी के सबसे लाडले बेटे, जल-जंगल-जमीन के सच्चे रखवाले और पृथक झारखंड राज्य आंदोलन के नायक ‘दिशोम गुरु’ शिबू सोरेन का 4 अगस्त 2025 को नई दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल में निधन हो गया। 81 वर्ष की आयु में अंतिम सांस लेने वाले गुरुजी के महाप्रस्थान के साथ ही झारखंड के इतिहास के एक गौरवशाली युग का अंत हो गया। प्रत्येक वर्ष 4 अगस्त का दिन उनकी पुण्यतिथि के रूप में याद किया जाएगा, जब संपूर्ण राज्य अपने इस महान सपूत को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है।
पिता के बलिदान से उपजी महाक्रांति
1950 के दशक में शिबू सोरेन के पिता सोबरन सोरेन की महाजनों द्वारा हत्या कर दी गई थी। इस अन्याय और शोषण ने 18 वर्ष के युवा शिबू के भीतर क्रांति का बीजारोपण किया। उन्होंने महाजनी प्रथा और बेगारी के खिलाफ “धान काटो आंदोलन” की शुरुआत की और आदिवासियों को उनकी ही जमीन पर उनका हक दिलाया।
JMM की स्थापना और उग्र जनांदोलन
4 फरवरी 1973 को धनबाद के गोल्फ ग्राउंड में शिबू सोरेन, विनोद बिहारी महतो और एके राय ने मिलकर ‘झारखंड मुक्ति मोर्चा’ (JMM) की नींव रखी। हाथों में तीर-धनुष और मांदर की गूंज के साथ लाखों आदिवासियों और मूलवासियों को एकजुट किया।
1980 में पहली बार सांसद बनकर वे दिल्ली पहुंचे और बिहार से अलग राज्य की मांग को राष्ट्रीय पटल पर रखा। 1990 के दशक में झारखंड से निकलने वाले कोयले और खनिजों की आर्थिक नाकेबंदी कर केंद्र सरकार को अलग राज्य के गठन पर विवश कर दिया।
15 नवंबर 2000 को सपने का साकार होना
दिशोम गुरु के अखंड संघर्ष और जन-आंदोलन का ही परिणाम था कि 15 नवंबर 2000 को भगवान बिरसा मुंडा की जयंती पर देश के 28वें राज्य के रूप में झारखंड का गठन हुआ।
राज्य बनने के बाद वे तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री पद पर भी रहे। दिशोम गुरु शिबू सोरेन केवल एक राजनेता नहीं थे, वे झारखंडी स्वाभिमान और अस्मिता के प्रतीक थे।
भले ही 4 अगस्त 2025 को वे भौतिक रूप से विदा हो गए, लेकिन जल, जंगल और जमीन की सुरक्षा के लिए उनका दिखाया मार्ग आने वाली पीढ़ियों का सदैव मार्गदर्शन करता रहेगा। उनकी पुण्यतिथि पर पूरा झारखंड उनके चरणों में नमन करता है।

